जीवन

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स्वप्न

Tuesday, October 25, 2011

उठ जाग मुसाफिर! भोर भई

उठ जाग मुसाफिर! भोर भई,
उठ

 जाग मुसाफिर!
अब रैन कहां जो सोवत है.
जो सोवत है सो खोवत है,
जो जागत है सो पावत है.
उठ जाग मुसाफिर! भोर भई
अब रैन कहां जो सोवत है.
टुक नींद से अंखियां खोल जरा
पल अपने प्रभु से ध्यान लगा,
यह प्रीति करन की रीति नहीं,
जग जागत है,तू सोवत है .
तू जाग जगत की देख उड़न,
जग जागा तेरे बंद नयन,
यह जन जाग्रति की बेला है,
तू नींद की गठरी ढोवत है.
लड़ना वीरों का पेशा है,
इसमें कुछ भी न अंदेशा है,
तू किस गफलत में पड़ा-पड़ा,
आलस में जीवन खोवत है.
है आजादी का लक्ष्य तेरा,
उसमें अब देर लगा न जरा,
जब सारी दुनिया जाग उठी
तू सिर खुजलावत सोवत है.
-वंशीधर शुक्ल

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